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ब्राह्मणों के त्याग और समर्पण

 ब्राह्मण दान देने पे आया तो -दधीचि, दान लेने पे आया तो सुदामा परीक्षा लेने पे आया तो -भृगु, तपोबल पे आया तो कपिल मुनि अहंकार को दबाने पे आया तो अगस्त मुनि धर्म को बचाने पे आया तो आदि शंकराचार्य नीति पे आया तो ... -चाणकय, नेतृत्व करने पे आया तो -अटल बिहारी, बग़ावत पे आया तो -मंगल पांडे, क्रांति पे आया तो -चंद्रशेखर आज़ाद, संगठित करने पे आया तो -केशव बलिराम हेगड़ेवार, संघर्ष करने पे आया तो -विनायक राव सावरकर- निराश हुआ तो -नाथु राम गोडसे और क्रोध मे आया तो -परशुराम

पापा

शब्द नहीं बयां कर सकते पापा के त्याग को

अपने सपनों का गला घोट दिया जब पहली औलाद पैदा हुई

 

परिवार की इच्छाओं को पूरा करने में, जवानी बुढ़ापे में तब्दील हुई 

क्या चाहते हैं पता नहीं खुद के लिए, परिवार की खुशियां ही मंजिल हुई 


अपने सपने की चिंता नहीं करते, 

औलाद को किसी चीज के लिए मना नहीं करते 


एक पिता है जो बिना मांगे सब देता है ,

 होगा औरों के लिए इंसान मेरे लिए वो साक्षात् देवता हैं 


एक पिता है जो सोचता है औलाद की,

 ख़ुद दुःख झेल कर भी सारी इच्छाएं पूरी करता है औलाद की 


पिता का होना ही काफ़ी हैं जीवन में, 

पिता के सिवा कोई अपना नहीं 


अब संघर्ष मुझे भी करना है पिता के सपनों को जीना है ,

पापा की हर इच्छा को अब मुझे अपनी इच्छा बनाना है l 

जो चाहते है पिता औलाद से वो सब कर दिखाना है,

पिता की भांति जीवन का एक लम्हा मुझे बिताना है l 

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